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स्वाती नक्षत्र की वो बूंद होता जा रहा हूं


तुम्हें स्वाती नक्षत्र की बूंदों का इंतजार करते हुए पपीहा तो दिखता है..कभी उसके दर्द को देखो, तड़प को देखो, पाने की आकांक्षा और पाने के बीच जो लंबा वक्त होता है..उस बेदर्द वक्त को देखो तब समझ आएगा। समुद्रभर आंशु बहाने पढ़ते हैं एक बूंद के लिए। वो महज बूंद नहीं जीवन है उसके लिए। वो उसका प्राप्तव्य है वो उसके त्याग का फल है वो उसके दर्द के बदले मिलने वाला पुरस्कार है। जानती हो उस एक बूंद की कीमत इतनी क्यों होती है..अनंत बूंदों में से सिर्फ वो एक बूंद को ही क्यों चुनता है क्योंकि वो बूंद ही उसका प्रेम है। जब प्रेम सीमाओं और हदों से भी ज्यादा गुजर जाता है तो वो स्वाती नक्षत्र की बूंद बन जाता है। जिसमें दर्द, तकलीफ, कराह, पीड़ा होती है लेकिन हर स्थिति-परिस्थिति से गुजकर वो इंतजार करता है उसका।

इस बीच कई सुंदर बूंदें आकर भी उसे रिझाती हैं, मादकता लिए हुए वे जल कण उसे रिझाते हैं पर वो प्रेम ही क्या जो प्रेयसी के आलावा किसी अन्य के आकर्षण में आ जाए। प्रेम तो अखंडता है जिसे खुद प्रेम के देवता और प्रेम की देवी भी आकर डिगाने की असंभव कोशिश करें। तब भी वो जीवन की कीमत पर खुद को न्यौछावर कर दे।



आसान लगता है, आसान दिखता है पर आसान नहीं होता स्वाती नक्षत्र की बूंद हो जाना...ये चमकती और अति प्रदर्शित प्रेम की खोखली दुनिया में भला उसका अस्तित्व कहां, वो यहां बसर कर भी नहीं सकता। ऐसे लोगों के बीच जो सिर्फ प्रेम का लिबादा ओढ़कर उस बूंद को बदनाम करने की कोशिश रच रहे हैं। पर याद रखें कई जिंदगियों की बलि देने पर, कई तरह की वेदनाओं को सहने के बाद वो बूंद बनी है, ये जगत का खोखलापन उसे चिढ़ा तक नहीं सकता मिटाने की तो बात ही दूर है। तुम प्रेम करो उस हद तक करो की वो बूंद हो जाओ उस बूंद में समाने के लिए जिसने बूंद होने के लिए बूंद जितना ही परिषह सहा है..मैं भी कुछ-कुछ बूंद सा हो रहा हूं..साथ ही मुझे लगता है कि कोई और भी बूंद होने की भरकश कोशिश में..फिर इंतजार कीजिए मिलन होगा। क्योंकि बूंद बनी है तो नक्षत्र भी होगा और उसे पीने का समय भी....

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