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@भीगे अल्फ़ाज़

काश! वक़्त रहते दिल के जज़्बातों को अल्फ़ाज़ों में भिगा दिया होता... तुम जब सामने थे मेरे.. काश तुम्हें अपना बना लिया होता.. यूँ तो कोई शिकवा नहीं है मुझे अब भी अपनी नामुकम्मल ज़िन्दगी से... पर काश! तुम्हारे नाम से नाम अपना मिला दिया होता... आज पहली दफा ऐसा लगा है मानो अपने जज़्बातों को तुम में कहीं छोड़ आया हूँ काश कि मुमकिन होता मेरे जज़्बातों को तुम्हारे अल्फ़ाज़ों में भिगोना... पहली मर्तबा अफसोस हुआ है दिल को वक़्त रहते दिल का हाल न बयां कर पाने का .. आँखे भीगी हैं और धड़कन तेज है न जाने क्या हो रहा है, जो भी हो रहा है समझ के परे है.. काश, ज़िन्दगी में कुछ नामुकम्मल कहानियों को लिखने का एक दूसरा मौका हासिल होता.. तो खुद से नाराज़गी कुछ कम होती..... पर ज़िन्दगी सबको दूसरा मौका अता नहीं करती.. अब सिर्फ एक काश के सहारे पूरी ज़िंदगी गुज़ारनी है..
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वक्त-वक्त की बात है

मैं गिरा हूं, ठहरा हूं... थका नहीं, हारा नहीं. फिर उठूंगा..उड़ूंगा अब दौड़ना लक्ष्य नहीं है उड़ना है मुझे बहुत ऊपर असफलता ने जिद पैदा की है सफलता को लपेटना की इंतजार कीजिए सवालों के जवाब भी मिंलेगें कुछ चेहरों पर हंसी बिखरेगी कुछ की हंसी उड़ भी जाएगी खैर, वक्त है वक्त का क्या है सब वक्त वक्त बात जो है  

जो न रोते हैं, न गुस्सा करते हैं, न तकलीफ बयां करते हैं, दर्द उन्हें भी होता है

सोचिए जिस सपने को साकार करने के लिए आपने सर्वस्व लगा दिया हो। संघर्षों भरी जिंदगी में आपकी उम्मीद सिर्फ वही हो, पूरी दुनिया से लड़कर आपने उस सपने को पूरा करने के लिए जी-जान लगाया हो लेकिन जब वही साकार हुआ सपने आपकी लिए ऐसा नासूर जख्म बन जाए जिसे न छुपा सकते हैं न जता। तब आपके पास क्या रास्ता बचता है। आप किसी से जाहिर नहीं कर सकते क्योंकि उसे आपने चुना था। आपका ही सपना था। आप गुस्सा नहीं कर सकते क्योंकि उसके आंसुओं में इतनी ताकत है तुम्हारा गुस्सा कोई मतलब नहीं रखता। गलती किसी की भी हो लेकिन अब गलत सिर्फ तुम हो। क्योंकि जिम्मेदारी तुम्हारी थी। पता नहीं क्यों पीड़ित हमेशा लड़कियों को ही कहा जाता है क्या लड़के कभी प्रताड़ित नहीं होते। क्या अच्छा होने की इतनी बड़ी सजा होती है कि तुम्हें हमेशा चुप्पी साधे रहना पड़ता है। एक लड़का भी अपने घर से अलग रहता है, बिल्कुल अपनी पत्नी की तरह। उस पर अपने घर की जिम्मेदारियां हैं। जिसे वो दिनरात मेहनत करके पूरा करता है। वो सब जगह कंप्रोमाइज करता है। बस इसलिए क्योंकि वो एक लड़का है। वो रो नहीं सकता। क्योंकि वो एक लड़का है। वो गुस्सा नहीं हो सकत...

रिश्ते, रास्ते और वो हमराही

प्रेम के धागे दिखाई नहीं देते पर बहुत मजबूत होते हैं इतने की यदि बंध जाएं तो फिर कई जन्मों तक नहीं छूटते। उन धागों की मजबूती इतनी है कि उसके सामने ह्रदयरूपी समंदर में उठने वाले उत्साह, शोक,भय, जुगुप्सा, वेद, सुख-दुख सारे भाव गौण हो जाते हैं। इतना ही नहीं उसके आगे जीवन का मौल भी मिट्टी हो जाता है। उन धागों की मजबूती ही प्रेम की खुराक है अस्तित्व है। इंसान के अस्तित्व से पहले का प्रेम का अस्तित्व है क्योंकि वो सिर्फ इंसानों का कर्म या धर्म नहीं है। जगत के सारे प्राणियों को जो आपसी बंधन में समेटे रखता है वह भी प्रेम का ही हिस्सा है। प्रेम सर्वत्र, सर्वदिश में व्याप्त है। ऐसा प्रेम अनंत है। असंख्य है। तुम न मुझसे हमेशा पूछती रहती थी न कि तुम बहुत अच्छा लिखते हो तो फिर कभी प्रेम पर क्यों नहीं लिखते। मैं हमेशा तुम्हारी बात टाल जाया करता था। क्योंकि मैं शब्दों की और खुद के शब्दों के ज्ञान की सीमा जानता हूं। मुझे पता है कि मैं प्रेम को शब्द देकर खुद का ही उपहास करूंगा। कोई कितना बड़ा ही लेखक क्यों न हो जाए पर वो प्रेम नहीं लिख सकता। जैसे कोई योगी आत्मा के उसे अनुभव को नहीं लिख सकता जिसे ...

अहसास

कुछ जज्बात जो दिल की गहराइयों में दफ़न हों कभी कभी लफ्जों में बयां हो ही जाते है ऐसेही कभी बातो बातों में किसी ने पुछा था कि रिश्ता है क्या हमारे बीच.. तब दिल के जज़्बात जबाँ पर तो...

सागर-सरिता की भेद खत्म होना ही प्रेम का अमरता है

कई नदियां, कई झरने और कई जल स्त्रोत आते हैं मुझमें समाने। मैं सबको खुद में समेट लेता हूं बिना किसी भेदभाव के बिना किसी स्वार्थ के। उन्हें खुद में सिर्फ मिलाता नहीं हू उन्हें अपने अस्तित्व का हिस्सा बना लेता हूं। क्योंकि मैं जानता हूं सरिता के समर्पण को बलिदान और त्याग को जो कई उलझनों, परेशानियों, पीड़ाओं, उलाहनों के साथ लाखों अवरोधों के बावजूद मुझमें समाने के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं। अपने उदभव से लेकर अंत तक सिर्फ अपने सागर में खो जाना चाहते हैं। लेकिन क्या तुम जानती हो सरिता ही सागर से मिलना नहीं चाहती। सागर भी उतना ही उत्कंठित रहता है। अपनी सरिता के आलिंगन के लिए। वो उसके बिना प्यासा है। वो जानता है कि वो सागर है बावजूद इसके वो प्यास से तड़पता रहता है, इंतजार करता रहता है। तुमने कभी सागर की लहरों को देखा है। हां देखा होगा लेकिन कभी पढ़ा नहीं है लहरों की आत्मा को छुआ नहीं है उसके भावों को पढ़ती तो तुम्हारी आंखे भी सरिता बन जाती और समुद्र में मिल जाती। वो लहरें सिर्फ ज्वार भाटा से उत्पन्न नहीं है वो तो सिर्फ आरोपित है। इस संवेदनाओं से रहित तथाकथित शिक्षित दुनिया को समझाने ...

भावों की वो सरिता हूँ मैं.....

कभी कभी जीवन हमें ऐसे दोराहे पे ला खड़ा करता है जहाँ आगे के दोनों रास्ते ही सही होते हैं या यूँ कहें कि दोनों ही गलत.. गलत और सही में सही चुनना बहुत आसाँ होता है किन्तु दो सही रास्...