काश! वक़्त रहते दिल के जज़्बातों को अल्फ़ाज़ों में भिगा दिया होता...
तुम जब सामने थे मेरे.. काश तुम्हें अपना बना लिया होता..
यूँ तो कोई शिकवा नहीं है मुझे अब भी अपनी नामुकम्मल ज़िन्दगी से...
पर काश! तुम्हारे नाम से नाम अपना मिला दिया होता...
आज पहली दफा ऐसा लगा है मानो अपने जज़्बातों को तुम में कहीं छोड़ आया हूँ काश कि मुमकिन होता मेरे जज़्बातों को तुम्हारे अल्फ़ाज़ों में भिगोना...
पहली मर्तबा अफसोस हुआ है दिल को वक़्त रहते दिल का हाल न बयां कर पाने का .. आँखे भीगी हैं और धड़कन तेज है न जाने क्या हो रहा है, जो भी हो रहा है समझ के परे है.. काश, ज़िन्दगी में कुछ नामुकम्मल कहानियों को लिखने का एक दूसरा मौका हासिल होता.. तो खुद से नाराज़गी कुछ कम होती..... पर ज़िन्दगी सबको दूसरा मौका अता नहीं करती.. अब सिर्फ एक काश के सहारे पूरी ज़िंदगी गुज़ारनी है..
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