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Showing posts from January, 2018

रिश्ते, रास्ते और वो हमराही

प्रेम के धागे दिखाई नहीं देते पर बहुत मजबूत होते हैं इतने की यदि बंध जाएं तो फिर कई जन्मों तक नहीं छूटते। उन धागों की मजबूती इतनी है कि उसके सामने ह्रदयरूपी समंदर में उठने वाले उत्साह, शोक,भय, जुगुप्सा, वेद, सुख-दुख सारे भाव गौण हो जाते हैं। इतना ही नहीं उसके आगे जीवन का मौल भी मिट्टी हो जाता है। उन धागों की मजबूती ही प्रेम की खुराक है अस्तित्व है। इंसान के अस्तित्व से पहले का प्रेम का अस्तित्व है क्योंकि वो सिर्फ इंसानों का कर्म या धर्म नहीं है। जगत के सारे प्राणियों को जो आपसी बंधन में समेटे रखता है वह भी प्रेम का ही हिस्सा है। प्रेम सर्वत्र, सर्वदिश में व्याप्त है। ऐसा प्रेम अनंत है। असंख्य है। तुम न मुझसे हमेशा पूछती रहती थी न कि तुम बहुत अच्छा लिखते हो तो फिर कभी प्रेम पर क्यों नहीं लिखते। मैं हमेशा तुम्हारी बात टाल जाया करता था। क्योंकि मैं शब्दों की और खुद के शब्दों के ज्ञान की सीमा जानता हूं। मुझे पता है कि मैं प्रेम को शब्द देकर खुद का ही उपहास करूंगा। कोई कितना बड़ा ही लेखक क्यों न हो जाए पर वो प्रेम नहीं लिख सकता। जैसे कोई योगी आत्मा के उसे अनुभव को नहीं लिख सकता जिसे ...

अहसास

कुछ जज्बात जो दिल की गहराइयों में दफ़न हों कभी कभी लफ्जों में बयां हो ही जाते है ऐसेही कभी बातो बातों में किसी ने पुछा था कि रिश्ता है क्या हमारे बीच.. तब दिल के जज़्बात जबाँ पर तो...

सागर-सरिता की भेद खत्म होना ही प्रेम का अमरता है

कई नदियां, कई झरने और कई जल स्त्रोत आते हैं मुझमें समाने। मैं सबको खुद में समेट लेता हूं बिना किसी भेदभाव के बिना किसी स्वार्थ के। उन्हें खुद में सिर्फ मिलाता नहीं हू उन्हें अपने अस्तित्व का हिस्सा बना लेता हूं। क्योंकि मैं जानता हूं सरिता के समर्पण को बलिदान और त्याग को जो कई उलझनों, परेशानियों, पीड़ाओं, उलाहनों के साथ लाखों अवरोधों के बावजूद मुझमें समाने के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं। अपने उदभव से लेकर अंत तक सिर्फ अपने सागर में खो जाना चाहते हैं। लेकिन क्या तुम जानती हो सरिता ही सागर से मिलना नहीं चाहती। सागर भी उतना ही उत्कंठित रहता है। अपनी सरिता के आलिंगन के लिए। वो उसके बिना प्यासा है। वो जानता है कि वो सागर है बावजूद इसके वो प्यास से तड़पता रहता है, इंतजार करता रहता है। तुमने कभी सागर की लहरों को देखा है। हां देखा होगा लेकिन कभी पढ़ा नहीं है लहरों की आत्मा को छुआ नहीं है उसके भावों को पढ़ती तो तुम्हारी आंखे भी सरिता बन जाती और समुद्र में मिल जाती। वो लहरें सिर्फ ज्वार भाटा से उत्पन्न नहीं है वो तो सिर्फ आरोपित है। इस संवेदनाओं से रहित तथाकथित शिक्षित दुनिया को समझाने ...

भावों की वो सरिता हूँ मैं.....

कभी कभी जीवन हमें ऐसे दोराहे पे ला खड़ा करता है जहाँ आगे के दोनों रास्ते ही सही होते हैं या यूँ कहें कि दोनों ही गलत.. गलत और सही में सही चुनना बहुत आसाँ होता है किन्तु दो सही रास्...

अव्यक्त प्रेम को व्यक्त कैसे करें?

जब किसी शब्दों को पढ़कर हम निःशब्द हो जाते हैं तो वह सिर्फ शब्द नहीं होते। ज्वार की भांती उठने वाली संवेदनाओं और संचेतनाओं से ओतप्रोत ज़ज़्बातों का विरेचन है। पवित्र व भीगे ह्रदय से लिखे जाने वाले इन शब्दों को लिखे जाने से मुश्किल होता है उतना ही पाक होकर पढ़ा जाना। ये प्रेम की तड़प से दिखने वाले द्रव्य आँसु हैं जो भिगाते तो हैं पर गीला नहीं करते। ये सूखे आंसू होते हैं। जो आत्मा के मिलन से सहगामी आत्मा (प्रेयसी)द्वारा बहाए जाते हैं। ये वो आंसू होते हैं जो प्रेम खाकर जन्म लेते है। प्रेम भी वो जो अव्यक्त ओर अमूर्त होता है। ऐसा प्रेम दर्द, पीड़ा, विरह की अथाह वेदना, मिलन की नउम्मीदी के अथाह सागर समुदिश कराह से उत्पन्न होता है। कभी शताब्दियों में कभी एकाद बार होता है इस अनुपम और अदभुत प्रेम का सूत्रपात। जो करता है अमर प्रेम को पुनःस्थापित। प्रेम सिर्फ अकेला नहीं होता दो हृदयों के बीच गाड़ सम्बन्ध पैदा होने पर अस्तित्व पाता है। यह इतना बारीक और गहरा होता है कि हज़ारों किलोमीटर दूर बैठकर एकदूसरे की धड़कनें गिन सकते हैं। सांसे महसूस कर सकते हैं। प्रेम जब निस्वार्थ हो जाता है तब ज्ञान की समर्थ भी उस...

तुम्हारा होना...

न जाने क्यूँ होता है ऐसा, हर बार ही तो होता है जब जब तुमसे मिलती हूँ तुम्हें सामने देख न जाने कहाँ गुम हो जाते है मेरे तमाम दर्द, दुःख,द्वन्द,अवसाद, भय। न जाने कहाँ खो जाती है सार...

स्वाती नक्षत्र की वो बूंद होता जा रहा हूं

तुम्हें स्वाती नक्षत्र की बूंदों का इंतजार करते हुए पपीहा तो दिखता है..कभी उसके दर्द को देखो, तड़प को देखो, पाने की आकांक्षा और पाने के बीच जो लंबा वक्त होता है..उस बेदर्द वक्त को देखो तब समझ आएगा। समुद्रभर आंशु बहाने पढ़ते हैं एक बूंद के लिए। वो महज बूंद नहीं जीवन है उसके लिए। वो उसका प्राप्तव्य है वो उसके त्याग का फल है वो उसके दर्द के बदले मिलने वाला पुरस्कार है। जानती हो उस एक बूंद की कीमत इतनी क्यों होती है..अनंत बूंदों में से सिर्फ वो एक बूंद को ही क्यों चुनता है क्योंकि वो बूंद ही उसका प्रेम है। जब प्रेम सीमाओं और हदों से भी ज्यादा गुजर जाता है तो वो स्वाती नक्षत्र की बूंद बन जाता है। जिसमें दर्द, तकलीफ, कराह, पीड़ा होती है लेकिन हर स्थिति-परिस्थिति से गुजकर वो इंतजार करता है उसका। इस बीच कई सुंदर बूंदें आकर भी उसे रिझाती हैं, मादकता लिए हुए वे जल कण उसे रिझाते हैं पर वो प्रेम ही क्या जो प्रेयसी के आलावा किसी अन्य के आकर्षण में आ जाए। प्रेम तो अखंडता है जिसे खुद प्रेम के देवता और प्रेम की देवी भी आकर डिगाने की असंभव कोशिश करें। तब भी वो जीवन की कीमत पर खुद को न्यौछावर कर...

प्रेम

किसी ने कहा कि वो सिर्फ दौड़ रहा है पर पहुँच नहीं रहा.. पाने की कोशिश तो जारी है पर वह तलाश ख़त्म नहीं करना चाहता... उसे प्यार का प्रतिकार समझ नहीं आता.. पर फिर भी उसे वो स्वीकार्य भी न...

साथ गुजारे लम्हे..

यादें नहीं है वो लम्हे, धड़कन है मेरे जज्बातों की.. याद तुम्हें भी है क्या वैसे ही बातें बीती बातों की.. साथ तुम्हारे जो गुजरे वो लम्हे अब भी वैसे ही है साँसों के आने जाने में वो लम्हे अब भी ठहरे ही है.. उन लम्हों को जीने फिर से, साथ मेरे तुम आओगे क्या साथ गुजारे सारे लम्हे फिर से वैसे दोहराओगे क्या.. वो बीते लम्हे, नींव बनेंगे प्रेम महल के सोचा न था हम तुम ऐसे मनमीत बनेंगे ये भी तो सोचा न था कितना कुछ है कहा, अनकहा उन लम्हो की बातों में.. कितना कुछ है सुना अनसुना उन प्रेम पगे जज्बातों में.. उन सारे जज्बातों के किस्से बुनने, साथ मेरे तुम आओगे क्या उन साथ गुजारे लम्हो सुधियाँ, तुम भी कभी दोहराओगे क्या..

मैं कुछ यादें, अहसास लेकर जा रहा हूं तुम चलोगी क्या।

मैं कुछ यादें, अहसास लेकर जा रहा हूं तुम चलोगी क्या। कुछ खास नहीं है साथ मेरे, बस मुझमें तुम्हें ले चलता हूं कुछ तेरे मेरे प्यार के हिस्से, कुछ मोहब्बत के किस्से कुछ अपना सा कुछ पराया सा संसार साथ ले चलता हूं मैं कुछ यादें, कुछ अहसास लेकर जा रहा हूं तुम चलोगी क्या ये जो अल्फाज है जज्बातों के सामने बौने से हैं बहुत कुछ है कहने को पर बताने की भी सीमाएं हैं मैं जानता हूं तुम मुझ मुझसे ज्यादा समझती हो फिर भी प्यार की इंतहा बताने जा रहा हूं तुम चलोगी क्या चल झूठे कहीं के जब कहती हों न तो सच पर भरोसा बढ़ जाता है तुम्हारा रूठना, आंखे चुराना तुममे कहीं ठहर सा जाता है सब साफ है फिर भी मुझे कुछ धुंधला सा लगता है दिल की सफाई को जा रहा हूं तुम चलोगी क्या बेइंतहा मोहब्बत नहीं तुम हो मुझमें उस अनंत, असंख्य जज्जबात मैं गिनने जा रहा हूं कुछ यादें, कुछ अहसास लेकर जा रहा हूं चलोगी क्या ये बस सफर है मैंने मंजिल का पता नहीं किया है पहुंचना कहां है क्यों है इन सवालों के जबाव भी नहीं हैं सवालों को सवालों से समझाने के लिए कहीं मैं जा रहा हूं कुछ यादें, कुछ अहसास लेकर ज...

कुछ रिश्ते न ऊपर वाला बनाता है न ही हम वो होते हैं अनादि से अनंत तक

समाज, परिवार की बंदिशों से उन्मुक्त होकर। जब सिर्फ ज़ज़्बातों की समझ, निश्वार्थ प्रेम में हृदय डुबकी लागाता है तब कुछ अव्यक्त से साथी आपके साथ होते हैं। उस अवस्था मे संकल्प विकल्प नहीं होते सिर्फ प्रेम बरसता है, आप उन झंझटों से पृथक होकर उस अनुपम संसार का हिस्सा हो जाते हैं, जहां सिर्फ आप होते हैं, आपसे ही लोग होते हैं। ये ऐसा संसार है जिसे कुछ लोग ही देख पाते हैं, कुछ ही समझ पाते हैं। असल मे ये प्रेम है जिसे भौतिक प्रेम से मापा नहीं जा सकता, समझाया, बताया, दिखाया नहीं जा सकता, वो सिर्फ तुम ओर में ही अनुभूत कर सकते हैं, ये अलौकिक प्रेम है, उच्च कोटि का प्रेम है ये वो प्रेम है जिससे ईश्वर की भी प्राप्ति हो सकती है, ईश्वर हुआ जा सकता है, अद्भुत है ये रिश्ता, अनंत विश्वास से बनी है इसकी नींव, दो का मिलना, दो कक होना और होते-होते एक एक हो जाना, अब इसे क्या नाम दूँ, इसे कैसे परिभाषित करूँ, शब्द दूँ तो तौहीन होगी, न दूँ तो अन्याय। पर मैं जानता हूँ मैं बोलूंगा तो शायद तुम कम समझोगी, खामोश रहूंगा तो ज्यादा, न सामने होने की जरूरत है, न आंखें मिलाने की। तुम मुझे जान रही हो, महसूस कर रही हो। मुझसी...