प्रेम के धागे दिखाई नहीं देते पर बहुत मजबूत होते हैं इतने की यदि बंध जाएं तो फिर कई जन्मों तक नहीं छूटते। उन धागों की मजबूती इतनी है कि उसके सामने ह्रदयरूपी समंदर में उठने वाले उत्साह, शोक,भय, जुगुप्सा, वेद, सुख-दुख सारे भाव गौण हो जाते हैं। इतना ही नहीं उसके आगे जीवन का मौल भी मिट्टी हो जाता है। उन धागों की मजबूती ही प्रेम की खुराक है अस्तित्व है। इंसान के अस्तित्व से पहले का प्रेम का अस्तित्व है क्योंकि वो सिर्फ इंसानों का कर्म या धर्म नहीं है। जगत के सारे प्राणियों को जो आपसी बंधन में समेटे रखता है वह भी प्रेम का ही हिस्सा है। प्रेम सर्वत्र, सर्वदिश में व्याप्त है। ऐसा प्रेम अनंत है। असंख्य है। तुम न मुझसे हमेशा पूछती रहती थी न कि तुम बहुत अच्छा लिखते हो तो फिर कभी प्रेम पर क्यों नहीं लिखते। मैं हमेशा तुम्हारी बात टाल जाया करता था। क्योंकि मैं शब्दों की और खुद के शब्दों के ज्ञान की सीमा जानता हूं। मुझे पता है कि मैं प्रेम को शब्द देकर खुद का ही उपहास करूंगा। कोई कितना बड़ा ही लेखक क्यों न हो जाए पर वो प्रेम नहीं लिख सकता। जैसे कोई योगी आत्मा के उसे अनुभव को नहीं लिख सकता जिसे ...