Skip to main content

भावों की वो सरिता हूँ मैं.....

कभी कभी जीवन हमें ऐसे दोराहे पे ला खड़ा करता है जहाँ आगे के दोनों रास्ते ही सही होते हैं या यूँ कहें कि दोनों ही गलत.. गलत और सही में सही चुनना बहुत आसाँ होता है किन्तु दो सही रास्तों में बेहतर और दो गलत रास्तों में मुनासिब का चुनाव बहुत कठिन होता है। जीवन के जिस दोराहे से ऐसे दो रास्ते जाते हो वहाँ खुद को समझाना, संभालना बहुत ही मुश्किल है क्यूँकि एक रास्ता जिस पर आप के साथ है आपके अपनों का कारवाँ, आपका वो हमसफ़र जिसने खायी है कसमें आपके हर सुख हर दुःख में साथ रहने की, जिस रास्ते पर है सारे सांसारिक सुख आपका स्वागत करते हुए.. और एक रास्ता.. जो है वीरान, जिस पर है आप अकेले, जहाँ न तो अपनों का कारवाँ है, न है वो सारे सांसारिक सुख, जहाँ है एक आत्मिक अनुभूति, जहाँ है सिर्फ प्राणों को प्राणों की आकांक्षा, जहाँ न कोई बंधन है न है कोई विवशता, जहाँ सिर्फ भावों की पवित्रता है प्रेम की निर्मलता है आत्मा की शुद्धता है, और जब आप किसी एक राह को चुन कर उसी पर चलना तय कर लेते है तब आप दूसरे के साथ नहीं करते है कोई अन्याय.. कई बार भावनाओं के पाश में उलझ कर खींच लेता है आपको दूसरे रास्ते का मोह.. और हृदय में जन्म ले लेती है एक लालसा.. किन्तु जब किसी मोह की तन्द्रा से बाहर आपको एक के प्रति कर्तव्यबोध होता है तो अनायास ही जन्म ले लेता है अपराधबोध, एक ग्लानि कुछ अपनों के प्रति, कुछ संवेदनाये साथी के प्रति.. परंतु तुम मत लेना स्वयं पर कोई भी अपराधबोध, न लाना रंच मात्र भी ग्लानि हृदय में। जानते हो क्यूँ? क्यूँकि तुम्हारे हृदय के हर द्वन्द, हर दुविधा, हर कर्तव्यबोध का भान है मुझे, और तुम्हारे जीवन के किसी भी कर्तव्यपथ पर, प्रेमपथ पर तनिक भी  बाधा,अवरोध स्वरूप नहीं पाओगे तुम मुझे। मैं तो तुम्हारे हृदय में उमड़ते भावो की वो निर्मल सरिता हूँ जिसका उद्गम भी तुम में है और अंत भी। देखा है कभी किसी सघन वन के ठीक मध्य में बहती उस शांत, निश्छल नदी को जो न जाने कितनों के प्राणों का आधार होती है, जीवन रेखा होती है उस वन की किन्तु उसका उद्देश्य मात्र एक होता है अपने गंतव्य तक पहुँचना, जन्म लेते ही एक अनवरत यात्रा पर निकल पड़ना और अंत में सागर में मिल जाना। जानते हो उस नदी के उद्गम के साथ ही उसका लक्ष्य भी निर्धारित होता है जाकर अपने सागर में मिल जाना और वह अनवरत यात्रा करती रहती है सिर्फ अपने सागर तक पहुँचने के लिए, सागर वहीँ ठहरा रहता है और सरिता बहती जाती है मीलों, मिलन का उद्देश्य लिए.. ये जानते हुए भी कि ठीक उसी के तरह और न जाने कितनी सरिताएं कर रही है मीलों का सफर तय, उस सागर में मिल जाने को.. जिससे मिलन हेतु हुआ है उसका उद्गम.. किन्तु वो बहती रहती है उतनी ही शांत, निर्मल और निश्छल.. उसे नहीं होता कभी भी उसी के सागर में मिलने के उद्देश्य को लेकर बहने वाली किसी भी सरिता से ईर्ष्या का अनुभव.. और न ही वो उत्पन्न करती है किसी भी नदी के मार्ग में कोई बाधा.. उसके इस सफर में न जाने कितने कल कल करते मनमोहक झरने आते है किंतु वह बहती जाती है अपने सागर की ओर.. और अंततः सागर में मिल कर देती है स्वयं को अस्तिवविहीन.. क्यूंकि उसके जीवन का आधार ही होता है मिलन का उद्देश्य.. उसका अस्तिव ही है सागर में मिलकर स्वयं को पूर्णतः सागर का हिस्सा कर लेना..
मैं भी भावों की वो सरिता हूँ जिसमें असंभव है किसी भी उद्वेग, स्वार्थ,उम्मीद या अपेक्षा रूपी बाढ़ का आना.. न ही किसी और सरिता से हो जिसे ईर्ष्या का अनुभव, न ही जो बने कैसा भी अवरोध। वो सरिता जो जानती है कि ठहरा हुआ है उसका सागर तुम्हारे हृदय के अव्यक्त भावों में.. और इस शांत, निश्छल, निस्वार्थ भावनाओं की सरिता का है एकमात्र उद्देश्य उन अव्यक्त भावों से आशना होकर सदा के लिए उनमें मिलकर स्वयं के अस्तिव को समाप्त कर देना....
किन्तु सागर सदैव ही रहता है हर सरिता से उन्मुक्त, स्वयं में असीमित गहराई लिए हुए जिसमे समा सकती है न जाने कितनी नदियाँ..

Comments

Popular posts from this blog

अहसास

कुछ जज्बात जो दिल की गहराइयों में दफ़न हों कभी कभी लफ्जों में बयां हो ही जाते है ऐसेही कभी बातो बातों में किसी ने पुछा था कि रिश्ता है क्या हमारे बीच.. तब दिल के जज़्बात जबाँ पर तो...

स्वाती नक्षत्र की वो बूंद होता जा रहा हूं

तुम्हें स्वाती नक्षत्र की बूंदों का इंतजार करते हुए पपीहा तो दिखता है..कभी उसके दर्द को देखो, तड़प को देखो, पाने की आकांक्षा और पाने के बीच जो लंबा वक्त होता है..उस बेदर्द वक्त को देखो तब समझ आएगा। समुद्रभर आंशु बहाने पढ़ते हैं एक बूंद के लिए। वो महज बूंद नहीं जीवन है उसके लिए। वो उसका प्राप्तव्य है वो उसके त्याग का फल है वो उसके दर्द के बदले मिलने वाला पुरस्कार है। जानती हो उस एक बूंद की कीमत इतनी क्यों होती है..अनंत बूंदों में से सिर्फ वो एक बूंद को ही क्यों चुनता है क्योंकि वो बूंद ही उसका प्रेम है। जब प्रेम सीमाओं और हदों से भी ज्यादा गुजर जाता है तो वो स्वाती नक्षत्र की बूंद बन जाता है। जिसमें दर्द, तकलीफ, कराह, पीड़ा होती है लेकिन हर स्थिति-परिस्थिति से गुजकर वो इंतजार करता है उसका। इस बीच कई सुंदर बूंदें आकर भी उसे रिझाती हैं, मादकता लिए हुए वे जल कण उसे रिझाते हैं पर वो प्रेम ही क्या जो प्रेयसी के आलावा किसी अन्य के आकर्षण में आ जाए। प्रेम तो अखंडता है जिसे खुद प्रेम के देवता और प्रेम की देवी भी आकर डिगाने की असंभव कोशिश करें। तब भी वो जीवन की कीमत पर खुद को न्यौछावर कर...

साथ गुजारे लम्हे..

यादें नहीं है वो लम्हे, धड़कन है मेरे जज्बातों की.. याद तुम्हें भी है क्या वैसे ही बातें बीती बातों की.. साथ तुम्हारे जो गुजरे वो लम्हे अब भी वैसे ही है साँसों के आने जाने में वो लम्हे अब भी ठहरे ही है.. उन लम्हों को जीने फिर से, साथ मेरे तुम आओगे क्या साथ गुजारे सारे लम्हे फिर से वैसे दोहराओगे क्या.. वो बीते लम्हे, नींव बनेंगे प्रेम महल के सोचा न था हम तुम ऐसे मनमीत बनेंगे ये भी तो सोचा न था कितना कुछ है कहा, अनकहा उन लम्हो की बातों में.. कितना कुछ है सुना अनसुना उन प्रेम पगे जज्बातों में.. उन सारे जज्बातों के किस्से बुनने, साथ मेरे तुम आओगे क्या उन साथ गुजारे लम्हो सुधियाँ, तुम भी कभी दोहराओगे क्या..