जब किसी शब्दों को पढ़कर हम निःशब्द हो जाते हैं तो वह सिर्फ शब्द नहीं होते। ज्वार की भांती उठने वाली संवेदनाओं और संचेतनाओं से ओतप्रोत ज़ज़्बातों का विरेचन है। पवित्र व भीगे ह्रदय से लिखे जाने वाले इन शब्दों को लिखे जाने से मुश्किल होता है उतना ही पाक होकर पढ़ा जाना। ये प्रेम की तड़प से दिखने वाले द्रव्य आँसु हैं जो भिगाते तो हैं पर गीला नहीं करते। ये सूखे आंसू होते हैं। जो आत्मा के मिलन से सहगामी आत्मा (प्रेयसी)द्वारा बहाए जाते हैं। ये वो आंसू होते हैं जो प्रेम खाकर जन्म लेते है। प्रेम भी वो जो अव्यक्त ओर अमूर्त होता है। ऐसा प्रेम दर्द, पीड़ा, विरह की अथाह वेदना, मिलन की नउम्मीदी के अथाह सागर समुदिश कराह से उत्पन्न होता है। कभी शताब्दियों में कभी एकाद बार होता है इस अनुपम और अदभुत प्रेम का सूत्रपात। जो करता है अमर प्रेम को पुनःस्थापित। प्रेम सिर्फ अकेला नहीं होता दो हृदयों के बीच गाड़ सम्बन्ध पैदा होने पर अस्तित्व पाता है। यह इतना बारीक और गहरा होता है कि हज़ारों किलोमीटर दूर बैठकर एकदूसरे की धड़कनें गिन सकते हैं। सांसे महसूस कर सकते हैं। प्रेम जब निस्वार्थ हो जाता है तब ज्ञान की समर्थ भी उसकी गुलामी करती है। फिर जानने, समझने, सहने की समस्त सीमाएं मृतप्रय हो जाती हैं। बचता है अनंत वीर्यत्व(सामर्थ्य) लिये प्रेम। अथाह, अनान्तनत..हमेशा।
कुछ जज्बात जो दिल की गहराइयों में दफ़न हों कभी कभी लफ्जों में बयां हो ही जाते है ऐसेही कभी बातो बातों में किसी ने पुछा था कि रिश्ता है क्या हमारे बीच.. तब दिल के जज़्बात जबाँ पर तो...
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