Skip to main content

अव्यक्त प्रेम को व्यक्त कैसे करें?

जब किसी शब्दों को पढ़कर हम निःशब्द हो जाते हैं तो वह सिर्फ शब्द नहीं होते। ज्वार की भांती उठने वाली संवेदनाओं और संचेतनाओं से ओतप्रोत ज़ज़्बातों का विरेचन है। पवित्र व भीगे ह्रदय से लिखे जाने वाले इन शब्दों को लिखे जाने से मुश्किल होता है उतना ही पाक होकर पढ़ा जाना। ये प्रेम की तड़प से दिखने वाले द्रव्य आँसु हैं जो भिगाते तो हैं पर गीला नहीं करते। ये सूखे आंसू होते हैं। जो आत्मा के मिलन से सहगामी आत्मा (प्रेयसी)द्वारा बहाए जाते हैं। ये वो आंसू होते हैं जो प्रेम खाकर जन्म लेते है। प्रेम भी वो जो अव्यक्त ओर अमूर्त होता है। ऐसा प्रेम दर्द, पीड़ा, विरह की अथाह वेदना, मिलन की नउम्मीदी के अथाह सागर समुदिश कराह से उत्पन्न होता है। कभी शताब्दियों में कभी एकाद बार होता है इस अनुपम और अदभुत प्रेम का सूत्रपात। जो करता है अमर प्रेम को पुनःस्थापित। प्रेम सिर्फ अकेला नहीं होता दो हृदयों के बीच गाड़ सम्बन्ध पैदा होने पर अस्तित्व पाता है। यह इतना बारीक और गहरा होता है कि हज़ारों किलोमीटर दूर बैठकर एकदूसरे की धड़कनें गिन सकते हैं। सांसे महसूस कर सकते हैं। प्रेम जब निस्वार्थ हो जाता है तब ज्ञान की समर्थ भी उसकी गुलामी करती है। फिर जानने, समझने, सहने की समस्त सीमाएं मृतप्रय हो जाती हैं। बचता है अनंत वीर्यत्व(सामर्थ्य) लिये प्रेम। अथाह, अनान्तनत..हमेशा।

Comments

Popular posts from this blog

अहसास

कुछ जज्बात जो दिल की गहराइयों में दफ़न हों कभी कभी लफ्जों में बयां हो ही जाते है ऐसेही कभी बातो बातों में किसी ने पुछा था कि रिश्ता है क्या हमारे बीच.. तब दिल के जज़्बात जबाँ पर तो...

स्वाती नक्षत्र की वो बूंद होता जा रहा हूं

तुम्हें स्वाती नक्षत्र की बूंदों का इंतजार करते हुए पपीहा तो दिखता है..कभी उसके दर्द को देखो, तड़प को देखो, पाने की आकांक्षा और पाने के बीच जो लंबा वक्त होता है..उस बेदर्द वक्त को देखो तब समझ आएगा। समुद्रभर आंशु बहाने पढ़ते हैं एक बूंद के लिए। वो महज बूंद नहीं जीवन है उसके लिए। वो उसका प्राप्तव्य है वो उसके त्याग का फल है वो उसके दर्द के बदले मिलने वाला पुरस्कार है। जानती हो उस एक बूंद की कीमत इतनी क्यों होती है..अनंत बूंदों में से सिर्फ वो एक बूंद को ही क्यों चुनता है क्योंकि वो बूंद ही उसका प्रेम है। जब प्रेम सीमाओं और हदों से भी ज्यादा गुजर जाता है तो वो स्वाती नक्षत्र की बूंद बन जाता है। जिसमें दर्द, तकलीफ, कराह, पीड़ा होती है लेकिन हर स्थिति-परिस्थिति से गुजकर वो इंतजार करता है उसका। इस बीच कई सुंदर बूंदें आकर भी उसे रिझाती हैं, मादकता लिए हुए वे जल कण उसे रिझाते हैं पर वो प्रेम ही क्या जो प्रेयसी के आलावा किसी अन्य के आकर्षण में आ जाए। प्रेम तो अखंडता है जिसे खुद प्रेम के देवता और प्रेम की देवी भी आकर डिगाने की असंभव कोशिश करें। तब भी वो जीवन की कीमत पर खुद को न्यौछावर कर...

साथ गुजारे लम्हे..

यादें नहीं है वो लम्हे, धड़कन है मेरे जज्बातों की.. याद तुम्हें भी है क्या वैसे ही बातें बीती बातों की.. साथ तुम्हारे जो गुजरे वो लम्हे अब भी वैसे ही है साँसों के आने जाने में वो लम्हे अब भी ठहरे ही है.. उन लम्हों को जीने फिर से, साथ मेरे तुम आओगे क्या साथ गुजारे सारे लम्हे फिर से वैसे दोहराओगे क्या.. वो बीते लम्हे, नींव बनेंगे प्रेम महल के सोचा न था हम तुम ऐसे मनमीत बनेंगे ये भी तो सोचा न था कितना कुछ है कहा, अनकहा उन लम्हो की बातों में.. कितना कुछ है सुना अनसुना उन प्रेम पगे जज्बातों में.. उन सारे जज्बातों के किस्से बुनने, साथ मेरे तुम आओगे क्या उन साथ गुजारे लम्हो सुधियाँ, तुम भी कभी दोहराओगे क्या..