न जाने क्यूँ होता है ऐसा, हर बार ही तो होता है जब जब तुमसे मिलती हूँ तुम्हें सामने देख न जाने कहाँ गुम हो जाते है मेरे तमाम दर्द, दुःख,द्वन्द,अवसाद, भय। न जाने कहाँ खो जाती है सारी चिंताएँ और पीड़ा, और मैं... मैं न जाने सुख के किस लोक में विचरण करने लगती हूँ न जाने क्या है तुम्हारे व्यक्त्वि में ऐसा जो कर लेता है मेरे अंतर को सम्मोहित और दूर कर देता सारी व्यथा.. जब जब विश्वास और स्नेह से से भरा हाथ तुम रखते हो मेरे सिर पर तब न जाने किस ईश्वरीय आशीष की अनुभूति हो उठती है मेरी आत्मा को.. तुम्हारे हाथों में अपना हाथ रखते ही क्यूँ प्रबल हो जाती है सबसे सुरक्षित होने की भावना, क्यूँ और दृढ़ हो जाता है मेरा ईश्वर के होने पर विश्वास इस एहसास मात्र से कि जीवन के इस समर में अकेली नहीं हूँ मैं। तुम हो सदैव मेरे आगे हर तीक्ष्ण वार से मेरी सुरक्षा हेतु किसी ढाल की भांति... कि तुम्हें सौंप सकती हूँ मैं वे व्यथाएँ, वे समस्त चिन्ताएँ, मन की वो पीड़ाएँ जिन के बोझ तले अक्सर खुद को असहाय पाती हूँ मैं, जिनसे बोझिल हो चूका मेरा जीवन लगने लगता है प्रायः अर्थविहीन मुझे, मेरी आँखों से नींद का बसेरा छीन लिया और मेरे स्वप्नों का नीड़ उजाड़ डाला है जिनने। किन्तु जानती हूँ मैं,, मुझसे तुम तक का पथ कहाँ सरल है.. जिस सेतु ने हम दोनों के अंदर के दर्द के सागरों को जोड़ा वो सेतु नहीं रखता कोई भी अस्तिव इन इंसानो के कबीलों मैं.. क्योंकि हर कबीले के होते है अपने कुछ नियम.. और हर कबीले के होते है कुछ सरदार.. जहाँ माने जाते है सिर्फ सरदारों के हुक्म.. और होती है सिर्फ उनकी हुकूमत... फिर भी मुझे से उस ईश्वर पर पूर्ण विश्वास जिसकी हुकूमत से बड़ा नहीं कोई इंसानी कबीला.. और उसी ईश्वर पर हो जाता है मेरा विश्वास और भी दृढ़ तुम्हारे साथ होने के अहसास मात्र से....
कुछ जज्बात जो दिल की गहराइयों में दफ़न हों कभी कभी लफ्जों में बयां हो ही जाते है ऐसेही कभी बातो बातों में किसी ने पुछा था कि रिश्ता है क्या हमारे बीच.. तब दिल के जज़्बात जबाँ पर तो...
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