प्रेम के धागे दिखाई नहीं देते पर बहुत मजबूत होते हैं इतने की यदि बंध
जाएं तो फिर कई जन्मों तक नहीं छूटते। उन धागों की मजबूती इतनी है कि उसके सामने
ह्रदयरूपी समंदर में उठने वाले उत्साह, शोक,भय, जुगुप्सा, वेद, सुख-दुख सारे भाव
गौण हो जाते हैं। इतना ही नहीं उसके आगे जीवन का मौल भी मिट्टी हो जाता है। उन
धागों की मजबूती ही प्रेम की खुराक है अस्तित्व है। इंसान के अस्तित्व से पहले का
प्रेम का अस्तित्व है क्योंकि वो सिर्फ इंसानों का कर्म या धर्म नहीं है। जगत के
सारे प्राणियों को जो आपसी बंधन में समेटे रखता है वह भी प्रेम का ही हिस्सा है।
प्रेम सर्वत्र, सर्वदिश में व्याप्त है। ऐसा प्रेम अनंत है। असंख्य है।
तुम न मुझसे हमेशा पूछती रहती थी न कि तुम
बहुत अच्छा लिखते हो तो फिर कभी प्रेम पर क्यों नहीं लिखते। मैं हमेशा तुम्हारी
बात टाल जाया करता था। क्योंकि मैं शब्दों की और खुद के शब्दों के ज्ञान की सीमा
जानता हूं। मुझे पता है कि मैं प्रेम को शब्द देकर खुद का ही उपहास करूंगा। कोई
कितना बड़ा ही लेखक क्यों न हो जाए पर वो प्रेम नहीं लिख सकता। जैसे कोई योगी
आत्मा के उसे अनुभव को नहीं लिख सकता जिसे उसने खुद में तदाकार होकर शरीर-आत्मा व
मन के भेद को खत्म करके पाया है। क्योंकि कुछ अहसास लिखे नहीं जा सकते। वह सिर्फ
महसूस करने के लिए होते हैं वो भी सबको नहीं कुछ को ही। बहुत विरले होते हैं वे
लोग जो कभी प्रेम को चखते हैं।
हां इतना जरूर है कि उस रसास्वादन का दावा
करने वाले वाले जगत में लाखों-करोड़ो मिल जाएंगे क्योंकि यहां तो विपरीत सेक्स के नैना
टकराने मात्र को ही प्रेम समझा जाता है। कई तो प्रेम समझने की भूल में पूरा जीवन
खत्म कर देते हैं उन्हें लगता है कि यह तो प्रेम है पर वो प्रेम नहीं होती जिसमें
अविश्वास, शिकायतें, जगड़े, मनमुटाव होता
है। प्रेम तो आनंद का विषय है। हमेशा सिर्फ आनंद, चेहरे पर अनंत नूर। प्रेम अदभुत
है। गजब है उसका चिंतन ही आनंद है उसकी अनुभूति तो आत्म अनुभूति सदृश्य है। मैं तो
प्रेम से ज्यादा ऐसे प्रेम को प्राप्त
करने वाले युगल को खोजता हू। देखना चाहता हू उनकी चाहत को उनके समर्पण को। प्रेम
की ताकत को लेकिन प्रेम तो छोड़िए उसके करने वाले भी नहीं दिखते अब तो....
हां कुछ प्रेम के प्यासे मेरे-तुम्हारे जैसे
लोगों को जरूर देखता हूं, उनकी प्रेम के लिए तड़प, उत्कंठा, निस्वार्थता देखकर
लगता है कि जब उस प्रेम के लिए चाहत इतनी है तो गर प्रेम मिल जाए तो क्या होगा।
प्रेम भी इंतजार करता है ऐसे प्रेमियों को जिसे वो वर सके। जिसमें वो समा सके। पर
रिश्ते-रास्तों के झंझावात में कहीं सिसक रहा है वो प्रेम।अंतिम सांसे ले रहा है।
क्योंकि उसकी जगह मार्केट में नये प्रेम ने जड़ें मजबूत कर लिया है। वो कैद है।
वासना, भावावेग की जद में। छूटना चाहता है। पर मजबूर है। क्योंकि प्रेमियों ने
नकली प्रेम को असली मान लिया है और असली की खोज खत्म हो गई है। अब भला जब नकली को
ही असली समझ लिया गया है तो फिर असली को ढूंढेगा कौन। कैसे आजाद होगा वो प्रेम।
पर याद रखना बहुत मुश्कल है उसे कैद कर
पाना। वो वापस आएगा। देख रहा हूं आशना की नजरों में उस आग को। जो ध्वस्त कर देगी
अव्यक्त होकर उस स्वांग रचने वाले प्रेम के अस्तित्व को। प्रेम फिर वापस आएगा।
आनंद के साथ। अनुभूति के साथ।
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