कई नदियां, कई झरने
और कई जल स्त्रोत आते हैं मुझमें समाने। मैं सबको खुद में समेट लेता हूं बिना किसी
भेदभाव के बिना किसी स्वार्थ के। उन्हें खुद में सिर्फ मिलाता नहीं हू उन्हें अपने
अस्तित्व का हिस्सा बना लेता हूं। क्योंकि मैं जानता हूं सरिता के समर्पण को
बलिदान और त्याग को जो कई उलझनों, परेशानियों, पीड़ाओं, उलाहनों के साथ लाखों
अवरोधों के बावजूद मुझमें समाने के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं। अपने उदभव से
लेकर अंत तक सिर्फ अपने सागर में खो जाना चाहते हैं। लेकिन क्या तुम जानती हो
सरिता ही सागर से मिलना नहीं चाहती। सागर भी उतना ही उत्कंठित रहता है। अपनी सरिता
के आलिंगन के लिए। वो उसके बिना प्यासा है। वो जानता है कि वो सागर है बावजूद इसके
वो प्यास से तड़पता रहता है, इंतजार करता रहता है।
तुमने कभी सागर की
लहरों को देखा है। हां देखा होगा लेकिन कभी पढ़ा नहीं है लहरों की आत्मा को छुआ
नहीं है उसके भावों को पढ़ती तो तुम्हारी आंखे भी सरिता बन जाती और समुद्र में मिल
जाती। वो लहरें सिर्फ ज्वार भाटा से उत्पन्न नहीं है वो तो सिर्फ आरोपित है। इस
संवेदनाओं से रहित तथाकथित शिक्षित दुनिया को समझाने के लिए। असली वजह तो वहुत
गंभीर है, बहुत बारीक है। इतनी कि उसके लिए क्षयोपशम नहीं, ज्ञान की प्रबलता नहीं,
भावों की अतिरेकता नहीं अपितु विरह का दर्द और पीड़ा ही समझ सकती है। सरिता उदगम
से बह रही है अपने अव्यक्त प्रेम में डूब जाने के लिए। सागर उद्वेलित हो रहा है
सरिता को अपने बाजूओं में कस के पकड़ लेने के लिए। गोयाकि सागर तो सागर है उसे लोग
रत्नाकर कहते हैं लेकिन क्या बिना संगिनी के रत्नों का कोई मौल है। सागर तो तब तक
वैरागी है जब तक संगिनी साथ नही है।
सागर में कई सरिताएं
सम्मिलित हैं लेकिन सपने सागर को अवकाश और छतृछाया ही समझा है। सबने सागर को आश्रय
बनाया है। इसलिए वो उसमें मिली हैं लेकिन वो आशना की तरह बहने वाली सरिता सागर के
आश्रय के लिए नहीं। सागर के प्रेम के लिए उसमें मिलना चाहती है। वो उसे अपना
सर्वस्व देना चाहती है बिना किसी शर्त के बिना किसी बंधन के। वो अथाह प्रेम करती
है रत्नाकर से। जिसे शायद ही रत्नाकर समझें। क्योंकि रत्नों की खान में मामूली
रत्न की क्या कीमत पर। कई रत्न उस सरिता से ज्यादा चमकते हैं। पर सागर के भीतर भी
एक सागर होता है जो जानता है कि कीमत चमक की नहीं चाहत की होती है। इसलिए कई
सरिताओं के मिले होने के बाद भी वो अपना सर्वस्व समर्पण करेगा। खुद को बलिदान
करेगा। सरिता को आलिंगित करेगा। इतना तीव्र की सागर-सरिता का भेद मिट जाए। लोग
सागर को सागर न कहें उसे राम-सीता, राधा-कृष्ण की तरह, सागर-सरिता कहें।
अव्यक्त-आशना कहें। यही उनके प्रेम की अमरता है।
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