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जो न रोते हैं, न गुस्सा करते हैं, न तकलीफ बयां करते हैं, दर्द उन्हें भी होता है



सोचिए जिस सपने को साकार करने के लिए आपने सर्वस्व लगा दिया हो। संघर्षों भरी जिंदगी में आपकी उम्मीद सिर्फ वही हो, पूरी दुनिया से लड़कर आपने उस सपने को पूरा करने के लिए जी-जान लगाया हो लेकिन जब वही साकार हुआ सपने आपकी लिए ऐसा नासूर जख्म बन जाए जिसे न छुपा सकते हैं न जता। तब आपके पास क्या रास्ता बचता है। आप किसी से जाहिर नहीं कर सकते क्योंकि उसे आपने चुना था। आपका ही सपना था। आप गुस्सा नहीं कर सकते क्योंकि उसके आंसुओं में इतनी ताकत है तुम्हारा गुस्सा कोई मतलब नहीं रखता।

गलती किसी की भी हो लेकिन अब गलत सिर्फ तुम हो। क्योंकि जिम्मेदारी तुम्हारी थी। पता नहीं क्यों पीड़ित हमेशा लड़कियों को ही कहा जाता है क्या लड़के कभी प्रताड़ित नहीं होते। क्या अच्छा होने की इतनी बड़ी सजा होती है कि तुम्हें हमेशा चुप्पी साधे रहना पड़ता है। एक लड़का भी अपने घर से अलग रहता है, बिल्कुल अपनी पत्नी की तरह। उस पर अपने घर की जिम्मेदारियां हैं। जिसे वो दिनरात मेहनत करके पूरा करता है। वो सब जगह कंप्रोमाइज करता है। बस इसलिए क्योंकि वो एक लड़का है। वो रो नहीं सकता। क्योंकि वो एक लड़का है। वो गुस्सा नहीं हो सकता, वो चिल्ला नहीं सकता  वो झल्ला नहीं सकता। वो सिर्फ सहन कर सकता है। वो सिर्फ बर्दास्त करने के लिए ही बना है क्योंकि उसने अपना सपना पूरा किया है।

पूरी दुनिया हमेशा उसे ही गलत ठहराएगी क्योंकि वो एक लड़का है। सबको यही लगता है कि लड़के सिर्फ किसी को प्रताड़ित करते हैं उन्हें कोई प्रताड़ित नहीं कर सकता। उसे कोई परेशान नहीं कर सकता। ये किसने थ्योरी दी है। कई लड़के ऐसे हैं जिन्होंने लड़कियों की प्रताड़ना से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। क्यों न करे। एक वही रास्ता तो बचता है। यदि वो लड़की को छोड़ता है तो सारी कानून व्यवस्था, सारी सामाजिक, पारिवारिक व्यवस्था उसके खिलाफ हो जाती है। ताने सांस लेने की तरह सुनता है। हर तरफ से एक ही आवाज आती है कि वो गलत है और जो गलत है उसे जीने का कोई अधिकार नहीं है।

ऐसे में यदि एक प्रताड़ित युवक आत्महत्या करता है तो उसमें अचरज क्या है। आप ही बताईए वो क्या करे। घर जाते ही उसे अपमान का विष पीना पड़ता है, झल्लाहट, गुस्सा, सहन करना पड़ता है, बिना गलती के परिवार के लोगों की उलाहना सुननी पड़ती है। वो रो भी नहीं सकता। किसी से कुछ कह भी नहीं सकता। तो वो क्या करे। बताईए आत्महत्या ही उपाय नहीं है तो फिर क्या है।
ये कैसा प्यार है, ये कैसे रिश्तेदार हैं जो सिर्फ एक पक्ष देखते हैं एक की ही सुनते हैं क्या जो आंसु बहाए वही सही होता है. क्या जो सब बर्दास्त कर रहा है उसकी बात सुनना भी सही नहीं है। सारी दुनिया उसे समझदारी का लबादा पहनाकर चुप कराना चाहती है वो रोज मरता है उस समझदारी के कारण, थोड़ा-थोड़ा हर दिन। उसे यही सलाह दी जाती है कि वो मरता रहे पर मरे नहीं। कोई साथ देने नहीं आता। कोई बिना आंखों से बरसे आंसु पोंछने नहीं आता। असल में सब स्वार्थ का संसार है। मृत्यू ही सच है वही समाधान है। इसलिए सब बर्दाश्त करने के बाद यदि कोई मर जाए तो उसे कायर मत कहना क्योंकि वो खुद से नहीं हारा वह सामाजिक बंधनों से हारा है। वह उन लोगों से हारा है जिन्हें लगता है कि लड़के ही लड़कियों को प्रताड़ित करते हैं उन्हें कोई नहीं कर सकता। वो उस मार्डन सोच से हारा है जिसने लड़कियों को इतनी स्वतंत्रता दी है कि वे अपने लड़कों को सिर्फ कुत्ता समझें। वे कहें तो उठें, वे कहें तो भौंके, वे कहें तो रोएं। 

काश किसी के जाने से कोई तो समझ सकेगा कि तकलीफ सबको होती है चाहे वो लड़का हो या लड़की।

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