समाज, परिवार की बंदिशों से उन्मुक्त होकर। जब सिर्फ ज़ज़्बातों की समझ, निश्वार्थ प्रेम में हृदय डुबकी लागाता है तब कुछ अव्यक्त से साथी आपके साथ होते हैं। उस अवस्था मे संकल्प विकल्प नहीं होते सिर्फ प्रेम बरसता है, आप उन झंझटों से पृथक होकर उस अनुपम संसार का हिस्सा हो जाते हैं, जहां सिर्फ आप होते हैं, आपसे ही लोग होते हैं। ये ऐसा संसार है जिसे कुछ लोग ही देख पाते हैं, कुछ ही समझ पाते हैं। असल मे ये प्रेम है जिसे भौतिक प्रेम से मापा नहीं जा सकता, समझाया, बताया, दिखाया नहीं जा सकता, वो सिर्फ तुम ओर में ही अनुभूत कर सकते हैं, ये अलौकिक प्रेम है, उच्च कोटि का प्रेम है ये वो प्रेम है जिससे ईश्वर की भी प्राप्ति हो सकती है, ईश्वर हुआ जा सकता है, अद्भुत है ये रिश्ता, अनंत विश्वास से बनी है इसकी नींव, दो का मिलना, दो कक होना और होते-होते एक एक हो जाना, अब इसे क्या नाम दूँ, इसे कैसे परिभाषित करूँ, शब्द दूँ तो तौहीन होगी, न दूँ तो अन्याय। पर मैं जानता हूँ मैं बोलूंगा तो शायद तुम कम समझोगी, खामोश रहूंगा तो ज्यादा, न सामने होने की जरूरत है, न आंखें मिलाने की। तुम मुझे जान रही हो, महसूस कर रही हो। मुझसी हो रही हो, मुझमें हो रही हो। बस यही है वो रिश्ता जो हम दोनों के बीच में हैं।
कुछ जज्बात जो दिल की गहराइयों में दफ़न हों कभी कभी लफ्जों में बयां हो ही जाते है ऐसेही कभी बातो बातों में किसी ने पुछा था कि रिश्ता है क्या हमारे बीच.. तब दिल के जज़्बात जबाँ पर तो...
भावों की एकदम सटीक अभिव्यक्ति...
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